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MS04 विनय-पत्रिका-सार सटीक ।। गो. तुलसी दासजी की साधना-पद्धति और साधनात्मक गति की बातें

विनय-पत्रिका-सार सटीक

     प्रभु प्रेमियों !  'विनय-पत्रिका-सार सटीक' पुस्तक की भूमिका में  सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज लिखते हैं-  विनय-पत्रिका निज विचारों और अनुभवों से भरा हुआ है ।  गो. तुलसीदास जी महाराज  योग , वैराग्य , ज्ञान और भक्ति को प्रेम के अत्यन्त मधुर रस में पागकर बने हुए अत्युत्तम मोदक ' विनय-पत्रिका ' में भरे पड़े हैं , जो भव-रोगों से ग्रसित दुर्बल और आत्म-बलहीन जीवों के लिए अत्यन्त पुष्टिकर हैं । इसमें गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज रचित ‘विनय-पत्रिका’ के कुछ पदों की सरल व्याख्या की गई है। बहुत ही अच्छी और सारगर्भित पुस्तक है। यह पुस्तक गोस्वामी तुलसीदास जी की साधना पद्धति और उनकी साधनात्मक गति का परिचयात्मक पुस्तिका है। 'विनय-पत्रिका' में भगवान श्री राम के प्रति तुलसीदास जी की गहरी भक्ति, विनम्रता (दास भाव), और पूर्ण समर्पण का भाव है, जिसे महर्षि जी ने आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया है। इस सार-सटीक का उद्देश्य पाठकों को गोस्वामी जी महाराज की अंतिम गति (मोक्ष की स्थिति) और उस तक पहुँचने के मार्ग को समझाना है, ताकि मनुष्य परम कल्याण प्राप्त कर सके। आइये इसकी एक झलक दैखे--

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विनय-पत्रिका-सार-सटीक
विनय-पत्रिका-सार सटीक

विनय-पत्रिका-सार सटीक की महत्वपूर्ण बातें

     प्रभु प्रेमियों  ! 'विनय - पत्रिका ' गोसाईं तुलसीदासजी महाराज का अन्तिम ग्रंथ है । यह उनके निज विचारों और अनुभवों से भरा हुआ है । गोसाईंजी महाराज ने ' रामचरितमानस ' को ' सद्गुरु ज्ञान विराग जोग के ' कहकर उसे योग का सद्गुरु बतलाया है । यदि . ग्रंथकर्ता स्वयं योग का सद्गुरु न हो , तो उनका ग्रंथ योग का सद्गुरु कैसे हो सकता है ? गोस्वामीजी महाराज योग के सद्गुरु थे , इस बात को उनकी ' विनय - पत्रिका ' भली भाँति सिद्ध कर देती है । योग , वैराग्य , ज्ञान और भक्ति को प्रेम के अत्यन्त मधुर रस में पागकर बने हुए अत्युत्तम मोदक ' विनय - पत्रिका ' में भरे पड़े हैं , जो भव - रोगों से ग्रसित दुर्बल और आत्म - बलहीन जीवों के लिए अत्यन्त पुष्टिकर हैं । गोस्वामीजी महाराज प्राचीन काल के नारद , सनकादिक और परम भक्तिन शबरी की तरह के और आधुनिक काल के कबीर साहब और गुरु नानक इत्यादि संतों की तरह के भक्ति की चरम सीमा तक पहुँचे हुए , योग और ज्ञानयुक्त भक्ति में परिपूर्ण और निर्मल सन्त थे । ऐसे सन्त के अन्तिम ग्रन्थ में उनकी अन्तिम गति का भाव अवश्य ही वर्णित होगा । इसी भाव को जानने और उसे संसार के सामने प्रकाश करने के लिए यह ' विनय - पत्रिका - सार सटीक ' लिखने का मैंने प्रयास किया है । इससे गोस्वामीजी महाराज की अन्तिम गति का और उस गति तक पहुँचने के मार्ग का पता लग जाता है । इस मार्ग को जानकर यदि मनुष्य इसपर चले , तो अन्त में गोस्वामीजी महाराज की तरह परम कल्याण पा सके । मनुष्य के लिए इससे बढ़कर लाभ दूसरा नहीं हो सकता । 




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सद्गुरु महर्षि साहित्य सुमनावली 

      MS05 . श्रीगीता-योग-प्रकाश- श्रीमद्भागवत् गीता के भ्रान्तिपूर्ण विचारों का सही निराकरण करने वाली पुस्तक "श्रीगीता-योग-प्रकाश" सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज द्वारा लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पुस्तक है। इसमें कौन-सा ध्यान करें? ध्यान के कितने प्रकार होते हैं? विविध प्रकार के ध्यानों में श्रेष्ठ ध्यान कौन-सा है? इत्यादि बातों पर चर्चा किया गया है। गीता के सच्चे भेद को इस रचना में उद्घाटित किया गया है। इसका प्रथम प्रकाशन सन् 1955 ई0 में हुआ था। इस पुस्तक में एक स्थल पर महर्षिजी कहते हैं- ‘समत्वयोग प्राप्त कर, स्थितप्रज्ञ बन कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ारूढ़ रह कर्त्तव्य कर्मों के पालन करने का उपदेश गीता देती है।’ योगः कर्मसु कौशलम् ' अर्थात् कर्म करने की कुशलता या चतुराई को योग कहते हैं । यहाँ ' योग ' शब्द उपर्युक्त अर्थों से भिन्न , एक तीसरे ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अतएव गीता के तात्पर्य को अच्छी तरह समझने के लिए ' योग ' शब्द के भिन्न - भिन्न अर्थों को ध्यान में रखना चाहिए । गीता न सांसारिक कर्तव्यों के करने से हटाती है और न कर्मबंधन में रखती है । समत्व - योग प्राप्त कर स्थितप्रज्ञ बन , कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ारूढ़ रह , कर्तव्य कर्मों के पालन करने का उपदेश गीता देती है । इसके बारे में विशेष जानकारी के  लिए  👉 यहां दबाएं.  

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MS04 विनय-पत्रिका-सार सटीक ।। गो. तुलसी दासजी की साधना-पद्धति और साधनात्मक गति की बातें MS04  विनय-पत्रिका-सार सटीक ।। गो. तुलसी दासजी की साधना-पद्धति और साधनात्मक गति की बातें Reviewed by सत्संग ध्यान on नवंबर 10, 2021 Rating: 5

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