प्रभु प्रेमियों ! लालदास साहित्य सीरीज के तीसरे पुस्तक के रूप में "संतमत का शब्द-विज्ञान " संतों के शब्द-संबंधी विशेष ज्ञान से संबंधित पद्य "अव्यक्त अनादि अनन्त अजय अज ..." की विस्तृत व्याख्या की पुस्तक है. आज इसी पुस्तक के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे.
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संतमत का शब्द-विज्ञान
संतों का शब्द-संबंधी विशेष ज्ञान से संबंधित पद्य
प्रभु प्रेमियों ! ' संतमत का शब्द - विज्ञान ' नाम्नी प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने संतों के शब्द - संबंधी विचारों को गागर में सागर की भाँति समाविष्ट करने का प्रयत्न किया है । शब्द ज्ञान अपार है । विद्या की अधिष्ठात्री देवी श्रीसरस्वतीजी के विषय में लिखा गया संस्कृत का यह श्लोक ध्यान देने के योग्य है -
नादाब्धेस्तु परं पारं न जानाति सरस्वती ।
अद्यापि मज्जनभयात् तुम्बं वहति वक्षसि ॥
अर्थात् नादरूपी समुद्र की सीमा का पार सरस्वतीजी भी नहीं जानतीं ; इसीलिए आज भी डूबने के भय से वे हृदय के पास तुम्बे को धारण किये हुई हैं ।
संसार में कोई भी क्रिया कम्पन के बिना नहीं हो सकती । सृष्टि के पूर्व अनन्तस्वरूपी परमात्मा ने अपनी अपरंपार शक्तिमत्ता से एक शब्द पैदा किया , उसमें जो कम्पन था , उसी से सारी सृष्टि का विकास हुआ । वेद , उपनिषद् , संतवाणी , बाइबिल , कुरान आदि प्रायः सभी धर्मग्रंथ इस बात को स्वीकार करते हैं कि शब्द से सृष्टि हुई है । यह शब्द संसार में ' ओम् ' कहकर विख्यात है । अंतस्साधना के द्वारा जिसकी सुरत इस शब्द को पकड़ती है , वही परमात्मा का साक्षात्कार कर पाता है । यह आदिशब्द परमात्मा का स्वरूप , अलौकिक , नित्य , सर्वव्यापी , निर्मल चेतन , निर्गुण , अव्यक्त और अकथनीय है । इस शब्द की बड़ी महिमा है ।
न नादेन विना ज्ञानं न नादेन विना शिवः ।
नादरूपं परं ज्योतिर्नादरूपी परो हरिः ।।
अर्थात् नाद के बिना ज्ञान नहीं हो सकता ; नाद के बिना कल्याण ' नहीं हो सकता ; नाद ही श्रेष्ठ ज्योतिस्वरूप है और नादरूप ही हरि हैं ।
परमाराध्य सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज अपनी पदावली के १२६ वें पद्य में कहते हैं कि यह आदिशब्द गुरु का स्वरूप , शान्ति प्रदान करनेवाला और अनुपम अर्थात् अद्वितीय है -
' गुरु ही सो शब्दरूप , शान्तिप्रद औ अनूप । '
इस पुस्तक में मुख्य रूप से इसी आदिशब्द के विविध गुणों केविषय में लिखा गया है । सच पूछा जाए , तो इस पुस्तक में ' महर्षि मँही पदावली ' के पाँचवें पद्य ( अव्यक्त अनादि अनन्त अजय अज ... ) की विस्तृत व्याख्या की गयी है ।
पुस्तक में आये जिस पद्यात्मक उद्धरण में केवल पद्य संख्या का निर्देश किया गया है , वह उद्धरण ' महर्षि मँहीँ - पदावली ' का समझा जाना चाहिए ।
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LS04. पिण्ड माहिँ ब्रह्माण्ड : सद्गुरुजी ने एक नक्शा लगवाया है , जिसका नाम है- “ अनन्त में सान्त , सान्त में अनन्त तथा ब्रह्माण्ड में पिण्ड , पिण्ड में ब्रह्माण्ड का सांकेतिक चित्र ।" थोड़ी भिन्नता के साथ यही नक्शा जहाँ-तहाँ संतमत के सत्संग - मन्दिरों की दीवार पर भी बनवाया गया देखने को मिलता है । बड़े हर्ष का विषय है कि लेखक ने पहले - पहल इस नक्शे पर व्याख्यात्मक ग्रंथ ' पिण्ड माहिँ ब्रह्माण्ड ' लिखकर इस दिशा में एक महान् और साहसपूर्ण कार्य किया है । पुस्तक दो खण्डों में विभाजित है । दोनों खण्ड इसी जिल्द में हैं । प्रथम ' पिण्ड ' खण्ड में पिण्ड के मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र तक के षट् चक्रों का वर्णन है और दूसरे ' ब्रह्माण्ड ' खण्ड में ब्रह्माण्ड के सहस्रदल कमल से लेकर शब्दातीत पद तक के सात दर्जों का वर्णन है । इस पुस्तक में और भी अनेक ऐसी बातें हैं , जो नक्शे की बातों से संबंधित तो हैं ; परन्तु नक्शे में नहीं हैं । सन्त - साहित्य के लगभग समस्त पारिभाषिक शब्द इस पुस्तक में व्याख्यायित होकर आ गये हैं ; अनेक नये तथ्य भी उभरकर सामने आये हैं । व्याख्या आदि से अन्त तक सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी है , जो बड़ी ही संतोषजनक और सर्वत्र सबल प्रमाणों से संपुष्ट है | ( ज्यादा जाने)
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LS03 संतमत का शब्द-विज्ञान || संतों का शब्द-संबंधी विशेष ज्ञान से संबंधित पद्य की विस्तृत व्याख्या
Reviewed by सत्संग ध्यान
on
दिसंबर 02, 2021
Rating: 5
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